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डुल्लू सरना (झारखंड, भारत) : तीन बच्चों की युवा मां सरिता असुर भारत के सबसे दूरदराज़ के आदिवासी इलाके में जीविका खेती करके गुजारा करती है। यह इलाका इतना अलगथलग है कि यह न केवल बिजली ग्रिड के दायरे से बाहर है, बल्कि अधिकतर भौगोलिक नक्शों से भी गायब दिखता है। सरिता और उसका जनजातीय समुदाय ‘असुर’ पूर्वी राज्य झारखंड में बसा है। अलगथलग पड़े इस भूभाग के करीब 50 फीसदी लोगों को बिजली उपलब्ध नहीं है। भारत के किसी और राज्य में बिजली से वंचित लोगों का प्रतिशत इतना बड़ा नहीं है।  

इसलिए आइएफसी की एक पुरानी क्लाएंट, निजी सौर ऊर्जा कंपनी अज़्युर पावर को जब इस राज्य में मिट्टी से बनी झोपड़ियों वाले 11 गांवों के 320 परिवारों को बिजली पहुंचाने का ठेका मिला, तो उसका सबसे पहला काम इन समुदायों का पता लगाना था। इंजीनियर लोग सरिता के गांव डुल्लू सरना सहित हरेक गांव के नियामकों की पहचान करने के लिए दलदली जंगल के बीच एक सप्ताह तक वाहन से या पैदल घूमते रहे। इसके बाद अज़्युर पावर ने देश के इस सबसे निर्धन इलाके की संकरी, कच्ची सड़कों से 450 पाउंड की बैटरियों समेत तमाम उपकरणों को पहुंचाने की व्यवस्था की।

सरिता कहती है, “ज़िंदगी में पहली बार मैंने स्विच दबाकर बत्ती जलाई तो इतनी खुशी हुई जितनी पहले कभी नहीं हुई थी. इसने मेरे परिवार की ज़िंदगी बदल दी।” उनके घर में एलईडी के तीन बल्ब लगाए गए हैं, जिन्हें आठ किलोवाट की ग्रिड से बिजली मिल रही है।


असुर समुदाय छोटा है इसलिए उसे सौर पेनलों से 18 घंटे तक स्वच्छ बिजली मिलती है जबकि इनसे औसतन 12 घंटे ही बिजली मिलती है। अब उनके गांव का हर परिवार मिट्टी के तेल की जगह सौर ऊर्जा के प्रयोग से अपनी अधिकांश बुनियादी जरूरतें पूरी करके हर महीने औसतन 200 से लेकर 300 रुपये तक की बचत कर रहा है। हर महीने करीब 25 रु. का मामूली सौर ऊर्जा शुल्क मिट्टी के तेल से जलने वाली लालटेनों आदि पर होने वाले खर्च से कहीं ज्यादा सस्ता है, और सुरक्षित भी।

सरिता कहती है, “रातों में मिट्टी के तेल की ढिबरी की नग्न लौ से मुझे बहुत डर लगता था। अब वैसी कोई चिंता नहीं रहती।”

सरिता असुर के घर में अब एलईडी बल्ब हैं - मिट्टी तेल की ढिबरी से अच्छे और सस्ते

सौर बिजली के कारण इन जनजातियों को अन्य लाभ तो हुए ही हैं, वे अब जंगली जानवरों को भी दूर रख पा रही हैं। इसके अलावा उन्हें दूसरे लाभ भी हुए हैं। कुछ साल पहले एक भटके हाथी ने 70 वर्षीय जेरोम असुर के घर की दो दीवारों को ढहा दिया था वे कहते हैं, “मैं क्या कर सकता था इतने बड़े जानवर के सामने?” अब रातों में गांव में रोशनी रहती है तो जानवर दूर रहते हैं।

कैसे पूरी होगी भारत की ऊर्जा संबंधी जरूरतें

दुनिया भर में करीब 1 अरब लोग ऐसे हैं जिन्हें बिजली की सुविधा नहीं हासिल है, इनमें से एक तिहाई लोग भारत में रहते हैं। सरिता असुर और उनके पड़ोसियों जैसे कई लोग हैं, जो ऐसे दूरदराज़ इलाकों में रहते हैं जहां उन्हें सामान्य ट्रांसमिशन लाइन से बिजली नहीं मिल सकती। इसलिए अगर सबको बिजली पहुंचाने के लिए ग्रिड से जुड़ी और ग्रिड से मुक्त, दोनों तरह की   व्यवस्था जरूरी है।

भारत अपनी 1.3 अरब की आबादी की ऊर्जा संबंधी जरूरतों को पूरा करने की जद्दोजहद में जुटा हुआ है। ग्रिड मुक्त सौर ऊर्जा के बाज़ार में भारत अग्रणी है और अकेले 2016 में वह 30 लाख से ज्यादा सौर संयंत्र बेच चुका है। लेकिन अभी बहुत कुछ करना बाकी है। भारत ने 2030 तक 40 प्रतिशत बिजली अक्षय ऊर्जा स्रोतों से पैदा करने का लक्ष्य रखा है। 2022 तक 175 गीगावाट सौर ऊर्जा विकसित करने की योजना है। चार साल पहले पूरी दुनिया में कुल लगभग इतनी ही सौर ऊर्जा विकसित की गई थी।

चित्र: अज़्युर पावर के छोटे सौर ग्रिड से अब दुलु सरना गांव में घरों को बिजली मिलती है।

भारत के इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करने के लिए निजी कंपनियां, सरकारी अधिकारी, आइएफसी जैसी बहुमुखी विकास संस्थाएं सौर ऊर्जा की क्षमता बढ़ाने के कार्यक्रम तैयार कर रही हैं। इन प्रयासों में विविधता भी है और इनकी पहुंच भी व्यापक है। निवेशक पूर्वी झारखंड के छोटे गांवों में स्वतंत्र माइक्रो ग्रिड बनाने, मध्य प्रदेश में जमीन पर विशाल सौर पार्कों के विकास, और पश्चिमी राज्य गुजरात के शहरों में इमारतों की छतों को सौर पेनेलों से ढकने में निवेश कर रहे हैं।

जमीन पर लगे पैनल, आसमान छूती क्षमता

भारत को अगर अपने महत्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करना है और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 2030 तक 35 फीसदी की कटौती करनी है, तो सरकार को यह लक्ष्य तय करना होगा कि कोयले की जगह सौर ऊर्जा से बिजली उत्पादन ज्यादा से ज्यादा हो। उदाहरण के लिए, अप्रैल 2017 में मध्य प्रदेश की सरकार ने 750 मेगावाट सौर ऊर्जा की रीवा अल्ट्रा मेगा सौर पार्क परियोजना पर काम शुरू किया। इसके पूरे होने पर ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में सालाना 10 लाख टन की कमी आ जाएगी और यह राज्य सौर ऊर्जा का लगभग दोगुना उत्पादन करने लगेगा।


सुदूर के गाँव में अक्सर बिजली के कनेक्शन नहीं होते, यहाँ ऑफ-ग्रिड सिस्टम एक वैकल्पिक समाधान है

रीवा सोअर पार्क ने भारत में कई रेकॉर्ड स्थापित किए हैं। इसके तहत देशव्यापी सौर परियोजना के लिए अब तक का न्यूनतम शुल्क तय किया गया है, जिसके चलते सौर ऊर्जा का शुल्क कोयला और तापबिजली से मिलने वाली बिजली के शुल्क के बराबर आ गया है। मध्य प्रदेश में अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देने वाली सरकारी एजेंसी के निदेशक मनु श्रीवास्तव कहते हैं, “रीवा परियोजना के कारण सबसे बड़ा बदलाव यह आया है कि कोई सरकारी सबसीडी न लेने के बावजूद सौर बिजली कोयले से मिलने वाली बिजली से सस्ती हो गई है।”

रीवा सौर पार्क के कारण पहली बार कोई सौर ऊर्जा पार्क दो राज्यों को सौर ऊर्जा वितरित करेगा. विश्व बैंक की मदद से, जिसके तहत इस परियोजना की ऊर्जा वितरण सुविधाओं के निर्माण के लिए 3 करोड़ डॉलर उपलब्ध कराया गया है, यह सौर ऊर्जा पार्क दिल्ली मेट्रो रेल निगम की दिन की ऊर्जा आवश्यकता का 80 तक प्रतिशत पूरा करेगा। दुनिया की सबसे व्यस्त मेट्रो सेवाओं मे शुमार दिल्ली मेट्रो कोयले पर अपनी निर्भरता तो घटा ही रहा है, अगले 25 वर्षों में वह बिजली के बिल में 16.8 करोड़ डॉलर की बचत भी करने की उम्मीद करता है।


दुनिया के करीब 1 अरब लोगो, जिन्हे बिजली नहीं मिलती, में से करीब एक-तिहाई लोग भारत में रहते है

आइएफसी ने रीवा परियोजना की वार्ताओं का नेतृत्व किया और उसे 57.5 करोड़ डॉलर का निजी निवेश हासिल करने में मदद की। इसने भुगतान गारंटी की ऐसी व्यवस्था लागू की कि वित्तीय जोखिम काफी कम हो गया और अंतरराष्ट्रीय निवेशक इसकी ओर आकर्षित हुए। इन कारणों से इस परियोजना ने न्यूनतम शुल्क हासिल किया। भारत सरकार सौर ऊर्जा की लागत कम करने के लिए दूसरे सभी राज्यों में रीवा वाले मॉडल को लागू करने की कोशिश कर रही है।


दुलु सरना गाँव में अज़्युर पावर द्वारा स्थापित छोटे सौर ग्रिड से वहां के घर रोशन होते हैं

छतों से छनती रोशनी

रीवा जैसी परियोजनाएं ऐसे इलाकों के लिए उपयुक्त हैं, जहां ज़मीन सस्ती और पर्याप्त रूप से उपलब्ध है। लेकिन भारत को घनी आबादी वाले शहरों में भी सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना है, जहां स्थान की कमी है। पश्चिमी राज्य गुजरात की राजधानी गांधीनगर ने, जहां साल के 365 में से 300 दिन भरपूर धूप मिलती है मगर स्थान की भारी किल्लत है, इस किल्लत का नया समाधान निकाला।

गुजरात सरकार के पूर्व सौर ऊर्जा वैज्ञानिक ओंकार जानी कहते हैं, “छतों पर सौर पेनेल (रूफटॉप सोलर पावर) का बाज़ार यहीं से शुरू हुआ।” करीब एक दशक पहले उन्होंने और आइएफसी ने मिलकर 5 मेगावाट की इस परियोजना को शुरू करने का डिजाइन तैयार किया था कि कौन सी टेक्नोलॉजी इस्तेमाल की जाए, पेनेलों को कैसे लगाया जाए, बिजली कहां भेजी जाए। आज भारत रूफटॉप सोलर पावर के तौर पर जो 3.4 गीगावाट बिजली पैदा कर रहा है, उसकी शुरुआत जिस पहले कार्यक्रम से हुई थी उसे आइएफसी ने ही तैयार किया था।

गांधीनगर में एक सरकारी इमारत की छत पर लगे सौर पैनल और पड़ोस में कोयले से चलने वाला सयंत्र

आइएफसी ने सबसे पहले शहर भर में उपयोग में आने वाली छतों की पहचान की, और लेनदेन का ढांचा तैयार किया, जिसने सरकारी परियोजना में निजी निवेशकों के लिए प्रतिस्पर्द्धी बोली लगाने की प्रक्रिया का रास्ता खोला। वित्तीय जोखिम को कम करने के लिए आइएफसी ने सुझाव दिया कि 80 फीसदी सौर पेनेल सरकारी इमारतों पर लगाए जाएं। आवासीय और सार्वजनिक इमारतों की छतों को लीज पर लेने के सामाजिक, कानूनी, और व्यावसायिक ब्यौरे भी तैयार किए गए। आइएफसी ने सरकार और टोरेंट पावर लि. (टीपीएल) के बीच वार्ता में भी भाग लिया ताकि शहर में टीपीएल जिस मुख्य बिजली ग्रिड को संचालित करती है उसमें देने के लिए सौर बिजली की खरीद की व्यवस्था तैयार की जा सके।

झारखंड के 11 गांवों में बिजली पहुंचाने वाली अज़्युर पावर ने भारत में पहला रूफटॉप प्रोग्राम 2013 में आइएफसी द्वारा दिए गए 30 लाख डॉलर के ऋण से शुरू किया। इस निवेश ने गांधीनगर में निजी मकानों और सार्वजनिक इमारतों की छतों पर हजारों रूफटॉप पेनेल लगाने में  अज़्युर पावर की मदद की, जिनके लिए उन छतों के मालिकों को कुछ खर्च नहीं करना पड़ा। सौदे की शर्तें स्पष्ट थीं— छतों को लीज़ पर देने के एवज में उनके मालिकों को उनके रूफटॉप  पेनेलों से पैदा होने वाली बिजली के आधार पर मासिक भुगतान किया जाएगा।

अज़्युर पावर को लीज़ पर अपनी छत देने वाले अनिरुद्ध सिंह चंदा कहते हैं, “मैं जितनी सौर बिजली दूंगा, उतना ही कम मुझे बिजली के लिए भुगतान करना पड़ेगा और कोयले पर उतना ही कम आश्रित होना पड़ेगा।” चंदा को हर महीने करीब 1400 रुपये मिलते हैं और इससे उनके बिजली बिल का भुगतान हो जाता है। वे कहते हैं, “सोलर पेनेल लगने से पहले मैं अपनी छत का साल में एक-दो बार ही इस्तेमाल करता था। अब उसका साल के 365 दिन इस्तेमाल हो रहा है।”

अनिरुद्धसिंह चंदा की छत पर लगे सौर पैनलो के किराये से उनकी पूरी ऊर्जा लागत निकल जाती है

अज़्युर पावर के पेनेल 10 हज़ार लोगों को स्वच्छ तथा भरोसेमंद बिजली उपलब्ध करा रहे हैं। ये शहर में गैसों के सालाना उत्सर्जन में 7000 मीट्रिक टन की कटौती भी कर रहे हैं, जिसका अर्थ है कि हर साल 80 लाख पाउंड कोयला जलाए जाने से बच जाता है। इस कार्यक्रम को गुजरात के दूसरे शहर और भारत के पार दूसरे देशों में भी लागू किया जा रहा है। मालदीव, श्रीलंका,  बांग्लादेश, और थाईलैंड जैसे तमाम देश आज रूफटॉप सोलर मॉडल को अपने यहां लगाने के रास्ते ढूंढ रहे हैं। विश्व बैंक ने रूफटॉप सोलर परियोजनाओं की खातिर भारतीय स्टेट बैंक को 62.5 करोड़ डॉलर का ऋण देकर इस क्षेत्र के विकास को बल प्रदान किया है।

इस क्षेत्र में सौर ऊर्जा के प्रसार की विविध और व्यापक कोशिशों की पुष्टि आंकड़े भी करते हैं। आइएफसी की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिण एशिया की जलवायु आधारित निवेश क्षमता 2030 तक 2.5 खरब डॉलर को छू सकती है।

अज़्युर पावर में सीनियर इंजीनियर निमेष प्रजापति जब गुजरात भर में रूफटॉप पेनेलों के निरीक्षण के बाद उनके परिणामों पर नज़र डालते हैं तो वे इन कोशिशों का समर्थन करते हैं। हाल में वे एक 10 मंज़िली इमारत का निरीक्षण कर रहे थे तब उन्हें दूर कहीं कोयले से चलने वाला एक बिजलीघर नज़र आया। वहां कोयले के ढेर से उठती भाप की ओर इशारा करते हुए वे कहते हैं, “यह था कल का भारत....” और फिर अपने सामने सुबह की धूप में चमकते सौर पेनेलों के नीले विस्तार की ओर इशारा करते हुए वे कहते हैं, “... और हम इस भारत की ओर बढ़ रहे हैं।”

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फरवरी 2019 में प्रकाशित